“औरत दया की पात्र”

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“औरत दया की पात्र”

ऐसा पुरुष जिसमें अभी अपने पुरुष होने का एहसास नहीं है,
देखा है पुरुषार्थ से पूर्व एक बच्चे को औरत रूपी भगवान से लिपटते हुए।

इस दुनिया को देखने की लालसा है भगवान देखूँ कैसे?
जन्म लेने के लिए उसी दया की पात्र औरत के गर्भ का सहारा लेते हुए,

मैं तो पैदा अबला के गर्भ से हुआ भूखा हूँ जीवित कैसे रहूँ?
दया की पात्र जो औरत ईश्वर ने बनाई है चलो उसी के दूध को पीते हैं।

मैं बलवान होने की इच्छा रखता हूँ पर यह पूर्ण होगा कैसे?
देखा है उसी अबला और दुर्बल के स्तन का पान करते हुए।

माँ के दूध के बिना क्षीण और बलहीन भी होते हुए।
देखा है खून से सिंचित कर उस अबला को अपने बल को भरते हुए।

अपने को सर्वज्ञानी और औरतों को जाहिल समझने वाले
उन पुरुषों को भी ख़ूब देखा है औरतों से मात खाते हुए।

औरतें दया की पात्र हैं कहने वालों पर तो इतनी दया आ गयी
कुछ पल बाद ही देखा एक औरत के सामने गिड़गिड़ाते हुए।

हमारे वेद पुराणों ने कहा कि यस्य नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।
देखा है औरत का अपमान, तुम जाहिल हो किसी काम की नहीं कहते हुए।

प्रेमिका के नख़रे पर सौ बार मारने वाले को
देखा है अपनी पत्नी को मूर्ख और अनपढ़ कहते हुए।

माँ, बेटी, बहन पत्नी के रूप में सर्वस्व लुटा कर भी वह कुछ कहती नहीं
बोझ हैं ये सब मेरे ऊपर ऐसा बार बार कहते हुए।

अबला है मित्रों तुम इन पर दया करना सदा
कहने वाले को भी देखा है औरत से प्रेम की भीख मांगते हुए।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश हो या कोई देवता सभी अपूर्ण रहे औरत के बिना,
इन तुच्छ मानव के घमण्ड की अति देखा है खुद को सर्वश्रेष्ठ समझते हैं औरत के बिना।

राह चलती औरत लगती है माल इन्हें और हर लड़की भी कमाल की।
इनकी ओछी सोच पर देखा है शर्म को भी शर्मिंदा होते हुए।
– Mala tripathऔरत को दया की पात्र समझने वाले पुरुष भूल जाते हैं कि उन्हें इस दुनिया में लाने वाली एक अबला औरत ही है।

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