कविता- क्या पाया?

क्या पाया?

सोंचों तुमने और हमने क्या पाया?
धैर्य इंसानों के लिए है।
पहले भी बिन वेतन कई महीनों जिया,
हड़ताल को वेतन अभाव मजाक बना दिया,
भूखमरी के बहाना ने कायर बना दिया,
सोंचों तुमने और मैंने क्या पाया?
सरकार ने क्या धमकी दिया?
आत्मविश्वास खो दिया,
शिक्षक परिवारों को 
बेसहारा कर दिया।अधिकार के लिए प्राण त्याग दिया,
सोंचों तुमने और मैंने क्या पाया?
हड़ताल तोड़ आग में प्राण झोंक दिया,
कोई इसे न समझा पाया!
जिसने खून के आँसू पीकर जिया,
पाकर वेतनमान अधूरी….
पाना संवैधानिक पूर्ण वेतनमान जरूरी
सोंचों तुमने और मैंने क्या पाया?
संघर्ष समन्वय समिति पर
आस्था और विश्वास के साथ
सरकार से वार्ता तक…
कैसे बताऊँ हड़ताल में डटे रहना
सभी की मजबूरी और जरूरी है
सोंचों तुमने और मैंने क्या पाया?
रचनाकार……🖌️मो०वसीम रज़ा (शिक्षक)

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