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बिहार के डॉक्टरों ने कहा- “अस्पताल में पीपीई और N95 मास्क डॉक्टरों को नहीं मिल पा रहा है तो मरीज़ों को कहां से मिलेगा?”

कोरोना संक्रमणGETTY IMAGES

कोरोना से निपटने की तैयारियों के मद्देनज़र केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि हर राज्य को अपने यहां एक स्पेशल कोरोना अस्पताल बनाना होगा.

पटना के एनएमसीएच को बिहार का कोरोना अस्पताल बनाने की घोषणा हुई है. लेकिन बिहार सरकार के इस फ़ैसले पर सवाल वहां के डॉक्टर उठाते हैं.

83 जूनियर डॉक्टरों ने अस्पताल प्रबंधन के साथ-साथ प्रधानमंत्री कार्यालय, बिहार स्वास्थ्य विभाग और मुख्यमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर कहा है, “अस्पताल में पीपीई और N95 मास्क डॉक्टरों को नहीं मिल पा रहा है तो मरीज़ों को कहां से मिलेगा?”

डॉक्टरों ने पत्र में ख़ुद के भी संक्रमित हो जाने की चिंता जताई है. इसलिए सेल्फ़ क्वरंटीन पर जाने की मांग की है.

एनएमसीएच में कोरोना के दो पॉज़िटिव मरीज़ भी भर्ती हैं. यह कोरोना अस्पताल के रूप में घोषित हो गया है इसलिए अब सारे मरीज़ कोरोना के संदिग्ध ही आ रहे हैं.

एनएमसीएच के जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रवि रमन कहते हैं, “हम लोग पिछले कई दिनों से कोरोना के संदिग्ध मरीज़ों का इलाज बिना पीपीई और मास्क के कर रहे हैं क्योंकि हमें प्रबंधन द्वारा दिया ही नहीं गया है.”

“जब-जब मांग की गई तब अस्पताल प्रबंधन ने कहा कि मंगवा रहे हैं. लेकिन आज तक वे मुहैया नहीं करा सके. जबकि अब यह कोरोना अस्पताल के रूप में घोषित हो चुका है और यहां दो पॉज़िटिव मरीज़ भी भर्ती हैं.”

रवि कहते हैं, “डॉक्टरों को पता है कि उन्होंने बिना WHO की गाइडलाइन के अनुपालन के संदिग्ध मरीज़ों का इलाज किया है. पिछले कई दिनों से कुछ डॉक्टरों को वायरल फ़्लू की समस्या थी. हमने अपनी ख़ुद की जांच कराई तो हमें कहा गया कि एहतियातन होम क्वरंटीन में रहें. इसलिए हमें सेल्फ़ क्वरंटीन पर जाने की मांग की थी, लेकिन अनुमति नहीं मिली. अब भी हम बिना संसाधनों और सुविधाओं के काम करने को मजबूर हैं.”

कुछ जूनियर डॉक्टरों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि मीडिया में बात जाने पर प्रबंधन उन्हें डरा रहा है. इस बात की धमकी दी जा रही है कि अभी उन्हें डॉक्टरी की डिग्री मिलनी बाकी है.

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सरकार की क्या हैं‌ तैयारियां?

डॉक्टरों की ओर से लगाए जा रहे आरोपों के बारे में बीबीसी ने एनएमसीएच के सुपरिटेंडेंट गोपाल कृष्ण से बात की और पूछा कि उनके यहां कोरोना से लड़ने की क्या तैयारियां हैं?

इसके जवाब में उन्होंने कहा, “हमारे पास 500 से अधिक बेड हैं. 43 वेंटिलेटर हैं. और वेंटिलेटर आ रहे हैं. पीपीई और N95 मास्कों की थोड़ी कमी ज़रूर है, मगर हमने डॉक्टरों से कहा है कि जल्द ही उपलब्ध करा दिया जाएगा. विभाग से बातचीत चल रही है. डॉक्टरों से हमारी अपील है कि वे चिंता न करें. अस्पताल प्रशासन उनका हर संभव ख़याल रखेगा. संकट के ऐसे वक़्त में शिकायतें नहीं करनी चाहिए.”

बिहार में 500 बेड की क्षमता वाला एक कोरोना अस्पताल इसलिए भी नाकाफ़ी लगता है क्योंकि अभी बिहार के अलग-अलग अस्पतालों में कोरोना के 1,228 संदिग्ध भर्ती हो चुके हैं और संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.

जांच की प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों, जांच में हो रही देरी, डॉक्टरों के लिए पीपीई और N95 मास्कों की अनुपलब्धता और कोरोना से निपटने की बाकी तैयारियों को लेकर हमने बिहार स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से बात करने कोशिश की लेकिन किसी से बात नहीं हो सकी.

वैसे बिहार सरकार के लिए सबसे बड़ा सवाल और सबसे बड़ी चुनौती उन 120 लोगों को ढूंढना है जो 15 जनवरी के बाद कोरोना प्रभावित देशों से बिहार आए लेकिन फ़िलहाल उनका कुछ पता नहीं है.

स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक़ इनका अभी तक पता नहीं चल पाया है. इनमें 68 मुज़फ्फरपुर में, 24 गोपालगंज में, 30 सारण में और अन्य बाकी ज़िलों में विदेश से आए लोग शामिल हैं.

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बिहार में क्या चल रहा है?

कोरोना वायरस के कारण देश भर में घोषित लॉकडाउन के दौरान तीसरी सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य बिहार में इस वक़्त क्या चल रहा है?

यह सवाल बिहार से जुड़े उन सभी लोगों के ज़हन में बार-बार आ रहा होगा जो इस वक़्त अपने-अपने घरों में बंद हैं.

उनके लिए सबसे पहली ख़बर यही है कि उन्हें आगे भी अपने घर में ही रहना चाहिए, क्योंकि लॉकडाउन का उल्लंघन करने पर बिहार पुलिस कठोर कार्रवाई कर रही है.

पिछले तीन दिनों में लॉकडाउन का उल्लंघन करने वाले 215 लोगों के खिलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है. उनमें से 85 लोगों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया. कुल 69,73,250 रुपए जुर्माने की राशि भी वसूली गई है.

दूसरी ख़बर मज़दूरों, रिक्शा चालकों और उन लोगों के लिए है जो बिहार के हैं मगर लॉकडाउन के कारण राज्य और देश के अलग-अलग हिस्सों में फंसे हैं.

बिहार के निवासियों को जो बिहार के किसी शहर में या बिहार से बाहर किसी दूसरे शहर में फंसे हैं उनको वहीं पर भोजन और आवास के लिए सरकार की तरफ़ से 100 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं.

तीसरी और एक महत्वपूर्ण ख़बर है कि हर जिले में खाने-पीने और ज़रूरी सामानों के दाम तय कर दिए गए हैं. डीएम को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे पैनिक बाइंग को रोकें और यह भी सुनिश्चित करें कि तय कीमत पर हर नागरिक तक सामान पहुंचे.

चौथी ख़बर उनके लिए है जो बाहर से लौटकर बिहार में वापस अपने गांव या घर आ चुके हैं.

बाहर से आए ऐसे लोगों को जिन्हें रखने से स्थानीय लोग संकोच कर रहे हैं, उनके लिए निकटवर्ती स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र में जांच से पहले रखने के लिए अस्थायी रूप‌ से क्वरंटीन सेंटर बनाया गया है. वे वहां जाकर जांच करा सकते हैं और ठीक पाए जाने पर होम क्वरंटीन का ठप्पा लगाकर अपने घर रह सकते हैं.

पांचवीं और सबसे चिंताजनक ख़बर यह है कि बिहार में मरीज़ों की संख्या लगातार बढ़ रही है. यहां यह संक्रमण न केवल बाहर ‌से आए लोगों तक सीमित है बल्कि उन लोगों तक भी पहुंच गया है जो स्थानीय हैं.

डर है कि कहीं यह ‘कम्युनिटी ट्रांसमिशन’ का रूप न ल‌े ले.

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क्यों है कम्युनिटी ट्रांसमिशन का ख़तरा?

कोरोना के संक्रमण का बिहार में पहला मामला 22 मार्च को आया था. इस तरह बीते चार दिनों में संक्रमण के मामले बढ़कर सात हो गए हैं.

एम्स (पटना) में एक व्यक्ति की मौत भी हो चुकी है, जिसकी टेस्ट रिपोर्ट मृत्यु के अगले दिन कोविड-19 पॉज़िटिव आयी.

मौत के बाद शव प्रबंधन को लेकर सवाल उठे थे क्योंकि मरीज़ के शव को बिना विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन के अनुपालन के टेस्ट रिपोर्ट आने से पहले ही परिजनों को सौंप दिया गया था और वे उस शव को मुंगेर स्थित अपने घर वापिस लेकर चले गए.

सवाल उठने पर एम्स की ओर से कहा गया कि मरीज़ की कोरोना की जांच रिपोर्ट मौत के अगले दिन आई थी. अस्पताल की डेथ रिपोर्ट में मरीज़ के मौत की वज़ह किडनी फ़ेल होना बताया गया था.

चूंकि मरीज़ में कोरोना का संक्रमण पाया गया था. इसलिए उससे जुड़े 62 लोगों के सैंपल जांच के लिए भेजे गए जो मरीज़ के संपर्क में आए थे.

कुछ की जांच रिपोर्ट आ चुकी है और चिंता इसी बात की है कि इनमें से दो लोग संक्रमित पाए गए हैं और वे मरीज़ के संबंधी ही हैं. बाकियों की रिपोर्ट आनी बाकी है.

अब स्वास्थ्य विभाग के सामने चुनौती उन लोगों को चिह्नित करना और उनकी जांच कराना है जिनका संपर्क पहले मरीज़ के संबंधियों से हैं. यदि उनमें से किसी की रिपोर्ट पॉज़िटिव आती है तो आईसीएमआर के अनुसार उसे ‘कम्युनिटी’ ट्रांसमिशन माना जाएगा.

कम्युनिटी ट्रांसमिशन यानी जिसमें संक्रमण सीधे किसी बाहर से आए व्यक्ति के संपर्क से नहीं बल्कि उस स्थानीय व्यक्ति से फैलेगा जो बाहर से आए लोगों के संपर्क में रहा हो और संक्रमित हुआ हो.

हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आईसीएमआर की रिसर्च के हवाले से कहा है कि भारत में अभी तक कम्युनिटी ट्रांसमिशन का एक भी मामला नहीं हुआ है लेकिन पटना के एम्स में पहले शव के मामले में लापरवाही और फिर मरीज के परिजनों की जांच रिपोर्ट पॉज़िटिव होने की बात इस डर को बढ़ा देती है।

(खबर:- सौजन्य से BBC हिंदी न्यूज़)

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