बिहार में शिक्षा व्यवस्था का बँटाधार-जिम्मेदार कौन?

बिहार या भारत में शिक्षा की बदहाल स्थिति क्यो?

आप जानते हैं कि बिहार ही नहीं पूरे भारत में चर्चा का विषय बना हुआ है कि बिहार या भारत के शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन क्यों गिरता जा रहा है?

लोग सरकारी विद्यालय से मुंह मोड़कर निजी विद्यालय के तरफ क्यों जाने लगे हैं ?

आईये इसका एक -एक कर जाँच – पड़ताल करें ।
सन 1990 के दशक मेँ जब विद्यार्थी बिहार बोर्ड से मैट्रिक और इंटरमीडिएट का परीक्षा फेल कर जाते थे तब लोग संस्कृत बोर्ड से मध्यमा,उपशास्त्री,शास्त्री का परीक्षा देकर बहुत अच्छा अंक प्राप्त कर लेते थे और टीचर ट्रेनिंग या बी.एड.कालेजों में नामांकन करा लेते थे। इतना अंक बिहार बोर्ड से मिल नहीं पाता था इसलिए उनलोगों के आगे बिहार बोर्ड से पास बच्चे मेधा अंक से छंट जाते थे, किसी-किसी का हीं टीचर ट्रेनिंग कालेजों में नामांकन हो पाता था। यहां तक कि बिहार बोर्ड से फेल विद्यार्थी यू० पी० बोर्ड से भी परीक्षा देकर पास ही नहीं बल्कि बहुत अच्छा अंक लाते थे।
इसी तरह सी बी एस ई बोर्ड से भी ली जाने वाली परीक्षा की पद्धति और अंकन करने की पद्धति ऐसी है कि इस बोर्ड से पास करने वाले बच्चों का अंक बिहार बोर्ड से पास बच्चों के अंक से बहुत ज्यादा होता है। इस खेल को तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव अच्छी तरह जान गये थे , इसीलिए वे शिक्षक की भर्ती को हीं रोक दिए थे।
शिक्षक अच्छे लोग बने इसलिए मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के कार्य काल में 1994 में शिक्षक भर्ती का प्रयोगिता परीक्षा ली गई। इसी प्रकार उन्ही के कार्य काल में और दो बार बी पी एस सी के द्वारा शिक्षक भर्ती की परीक्षा लेकर शिक्षक बहाल किए गए। बिहार में शिक्षक की कमी बहुत हो गई थी जिसकी भरपाई के लिए वर्ष 2003और 2005 में 11माह के अनुबंध पर 1500रु के मानदेय पर शिक्षा मित्रों की बहाली की गई, फिर भी विद्यालय में शिक्षकों की बहुत कमी थी।

वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में राबड़ी देवी की सरकार चली गई।अगला मुख्यमंत्री जद यू पार्टी के मुखिया नीतीश कुमार बने। वर्ष 2006 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री वृषिण पटेल द्वारा भारी संख्या में लगभग ढाई लाख शिक्षकों की सर्टिफिकेट लाओ नौकरी पाओ के तर्ज पर पंचायत शिक्षक, प्रखंड शिक्षक, नगर शिक्षक, नगर परिषद शिक्षक की कोटि बनाकर इनकी भर्ती ली गई और एक नियमावली बनाई गई जिसके द्वारा पंचायत शिक्षक नियोजन समिति, प्रखंड शिक्षक नियोजन समिति, नगर परिषद शिक्षक नियोजन समिति बनाकर इस नियोजन समिति के द्वारा नियोजित शिक्षकों की बहाली किए गये। जिसमें इन बहाल शिक्षकों की सेवा 60 वर्ष की आयु तक के लिए कर दी गई तथा बहाली की आयु सीमा 18 से 37 वर्ष निर्धारित की गई जिसमें आरक्षण वाले अभ्यर्थी को पांच वर्ष तक की छूट दी गई। महिला अभ्यर्थी को प्रत्येक कोटि में वर्ग पांच तक के लिए 50% सीट आरक्षित था।
इसके साथ ही वर्ष 2003 और 2005 में बहाल शिक्षामित्रों को भी जुलाई 2006 से पंचायत शिक्षक की दर्जा दे दी गई । इन सभी कोटि के शिक्षकों को एक नियत मानदेय ट्रेंड शिक्षक के लिए 5000रूपया और अनट्रेंड शिक्षकों के लिए 4000 रूपए कर दी गई। प्रत्येक तीन वर्ष पर इन शिक्षकों की दक्षता परीक्षा लेकर इस नियत वेतन में वृद्धि ट्रेंड शिक्षक के लिए 500रू और अनट्रेंड शिक्षक के लिए 300रू की वृद्धि नियमावली में व्यवस्था थी जो बाद में सुधार कर दक्षता पास होने पर ट्रेंड तथा अनट्रेंड के लिए प्रतिवर्ष क्रमशः 167रू और 100 रू कर दी गई । बाद में प्रत्येक तीन वर्ष पर दक्षता पास शिक्षकों के लिए पुन: दक्षता परीक्षा देने की अनिवार्यता को भी समाप्त कर दी गई।
इसके बाद इस नियमावली को सुधारकर आर टी ई-2009 के तहत वर्ष 2011से टी ई टी का परीक्षा लेकर उसी मानदेय में शिक्षकों की भर्ती होने लगी और समय -समय पर वेतन वृद्धि के लिए इन सभी नियोजित शिक्षकों के द्वारा आंदोलन करने पर इनका वेतन बढ़ते-बढ़ते अब लगभग 25000 रू से लेकर 30000 रु तक मासिक हो गई है। जहां उसी जगह नियमित शिक्षकों का वेतन 75000रू से लेकर 85000रू मासिक है। इन नियोजित शिक्षकों की वेतन एक चपरासी से भी कम होने के कारण ये नियोजित शिक्षक अपने को हीनता महसूस करते हैं और समाज के साथ-साथ पदाधिकारी भी इन्हें नीचा दृष्टि से देखते हैं, जिसका बैड इफेक्ट शिक्षण कार्यों पर पड़ता है।अब तक इन नियोजित शिक्षकों की संख्या बढ़कर लगभग चार लाख तक हो गई है।
अब चलते हैं इस शिक्षक भर्ती प्रक्रिया पर। नियम था इंटरमीडिएट के अंक पर मेधा सूची तैयार करने का और जो अभ्यर्थी ट्रेंड था पहले उन्हें लेने का इसके बाद बची सीट पर अनट्रेंडों की बहाली करने का। इन अनट्रेंड शिक्षकों की बिहार सरकार द्वारा छव वर्ष में ट्रेंड करने की एन सी टी ई द्वारा समझौता की गई थी,जो अब सब शिक्षक ट्रेंड हो चूके हैं। अब इस शिक्षक बहाली में वे सभी अभ्यर्थी सफल हो गए जिसे लालू प्रसाद ने रोक रखा था । अर्थात संस्कृत शिक्षा बोर्ड, यू पी बोर्ड तथा सी बी एस ई बोर्ड वाले अभ्यर्थी। बिहार बोर्ड वाले अभ्यर्थी इस शिक्षक भर्ती में बहुत कम ही सफल हो पाये हैं। इसके अलावे फर्जी सर्टिफिकेट वाले कुछ अभ्यर्थी भी सफल हो गए, जिसकी जांच चल रही है।अब इसमें किसका दोष है आप स्वयं जान सकते हैं।
अब चलते हैं कुकुरमुत्ते की तरह फैले निजी विद्यालयों के तरफ जिन्होंने सी बी एस ई बोर्ड से मान्यता ले रखी है और कितने बिना मान्यता के भी हैं।उपर में मैंने तर्क कर चुका है कि सी बी एस ई बोर्ड से बिहार बोर्ड के अपेक्षा ज्यादा अंक प्राप्त होता है क्योंकि परीक्षा और मार्किंग का ऐसा विधि हीं है। आप यह भी जानते हैं कि नीट, आई आई टी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने के लिए 75% अंक का होना आवश्यक है, जिसमें बिहार बोर्ड से पास बच्चे मार खा जाते हैं। यही कारण है कि सी बी एस ई बोर्ड से मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों के तरफ अभिभावक रूझान करते हैं।
आप जानते हैं कि सी बी एस ई बोर्ड वाले निजी विद्यालयों को किसने खोल रखा है – नेता, मंत्री, विधायक, पूंजीपति। इन्हीं की सरकार है और इन्हीं के गलत नीतियों के कारण ही इनकी दुकान खुब फूलती-फलती है और सरकारी विद्यालयों को बदनामी की जाती है। अच्छी पढ़ाई के नाम पर साधारण लोग भी उंची फीस देकर फंस जाते हैं। क्योंकि बहुत अच्छा अंक प्राप्त होता है ताकि नीट,आई०आई०टी०की प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठ सके। जो बिहार बोर्ड से संभव नहीं हो पाता है। हालांकि अब बिहार बोर्ड में भी परीक्षा का पैटर्न सी बी एस ई बोर्ड की तरह कर दिए जाने से बिहार बोर्ड में भी बच्चे अच्छे अंक प्राप्त करने लगे हैं। जिससे निजी विद्यालयों पर धक्का लगने लगा है। यही कारण है कि निजी विद्यालयों के पढ़ाई का गुणगान खुब होता है। लेकिन इस सच्चाई का पता तब चलता है जब पढ़ाई के नाम पर उन्हें घर पर ट्यूटर लगाना पड़ता है। आप जान सकते हैं कि इन सबके बच्चों का नामांकन सरकारी विद्यालयों में भी होता है। जो विद्यालय नहीं आते हैं तो भी उनकी हाजिरी बनानी पड़ती है। क्योंकि उन्हें सरकारी सुविधाएं लेनी होती है जैसे-छात्रवृति, पोशाक राशि, साइकिल, नवोदय विद्यालय में नामांकन सिमुलतला में नामांकन आदि-आदि।
यह सुविधा लेने के लिए विद्यालय में बच्चों की 75% उपस्थिति अनिवार्य है। आर टी ई के तहत प्रधानाध्यापक को नामांकन लेना भी अनिवार्य है नहीं तो उनपर विद्यालय शिक्षा समिति, शिक्षा पदाधिकारियों का दबाव बढ़ जाएगा। यह भी मालूम होना चाहिए कि मध्याह्न भोजन के चावल और राशि बच्चों की उपस्थिति की संख्या पर ही आता है। अब ये बच्चे विद्यालय तो आते नहीं, इसलिए इन बच्चों के मध्याह्न भोजन के चावल और राशि बच जाता है जिसका बंदर बांट शुरू हो जाता है,जो पदाधिकारियों तक जाता है, नहीं तो प्रधानाध्यापक का खैर नहीं।
अब बारी आता है सरकारी विद्यालय में वास्तविक बच्चों के नामांकन और उसकी उपस्थिति की, इसमें लगभग 30% बच्चें गरीबी के कारण माता-पिता के काम में हाथ बंटाने में फंस जाते हैं जिससे विद्यालय कभी कभार ही आ पाते हैं जिससे ये पढ़ाई को ठीक ढंग से समझ नहीं पाते हैं और न हीं टास्क(होम वर्क) बना पाते हैं। लगभग 60% बच्चे हीं प्रतिदिन विद्यालय में आ पाते हैं जिनमें से 20% बच्चे हीं होम वर्क पूरा कर पाते हैं तथा पढ़ाई को ठीक ढंग से समझ पाते हैं।
शेष बच्चे पारिवारिक शैक्षिक पिछड़ेपन के कारण न टास्क बना पाते हैं और न ही पढ़ाई को ठीक ढंग से ही समझ पाते हैं। इसके पीछे कारण यह भी है कि सरकार के गाइड लाइन के अनुसार जब बच्चे का उम्र छव वर्ष की है तो उसका नामांकन वर्ग 1 में यदि 10 वर्ष की है तो वर्ग 4 में नामांकन लेना अनिवार्य है और उसे उस वर्ग के स्तर तक उसी सत्र में ज्ञान प्राप्त करा देना भी है ।
दूसरी तरफ यदि विद्यालय में कड़ाई का पालन भी की जाय तो अगले दिन से कमजोर विद्यार्थी विद्यालय आना हीं बंद कर देंगे। लेकिन ऐसा निजी विद्यालयों में नहीं होता,बल्कि बच्चा किसी भी उम्र का हो बच्चा और अभिभावक का टेस्ट लेकर उसके ज्ञान के स्तर वाले वर्ग में नामांकन होता है और उसका उम्र सुधार कर उस वर्ग के लायक कर दिया जाता है। चूंकि बच्चा घर पर टास्क बना लें और अभिभावक उसे बनवाने में मदद करे इसलिए उसके अभिभावक का टेस्ट भी लिया जाता है। इसमें अक्षम अभिभावक के बच्चे को नामांकन से बंचित कर दिया जाता है ताकि विद्यालय का रेपुटेशन खराब न हो। अभिभावक भी कम चालाक नहीं है सरकारी विद्यालय से मिलने वाले छात्रवृति और पोशाक राशि को निजी विद्यालयों में देने के काम करते हैं और देंगे भी क्यों नहीं? इसी नजायज लाभ के लिए ही तो सरकारी विद्यालय में नामांकन करा रखा है।
यह बात सही है कि सरकारी विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक नहीं के बराबर है साथ ही गणित और विज्ञान के शिक्षक भी कम है जो कम वेतन होने के कारण सरकारी विद्यालय में आना ही नहीं चाहते। ऐसी बात नहीं है कि सरकारी विद्यालयों के शिक्षक निजी विद्यालयों के शिक्षकों से ज्ञान में कमजोर है। सरकारी शिक्षकों को बहुत छान बीन करके बहाल किया जाता है इससे बंचित व्यक्ति ही निजी विद्यालयों में पढ़ाने का काम करते हैं। अब यदि शिक्षक पढ़ाये ही नहीं तो यह उसका ढिठाई ही कहा जाएगा। ऐसे लोगों पर सरकार कार्रवाई करे। दूसरी तरफ उसे किसी दूसरे काम में न लगाए। इसमें शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों को भी ईमानदारी पूर्वक अपने कार्य को निभाना पड़ेगा। तभी शिक्षा का स्तर ऊंचा उठेगा। पहले तो पांचवां और सातवां पास व्यक्ति ही शिक्षक थे जो पूरी तन्मयता के साथ पढ़ाते थे जो आज रिटायर हो गए हैं। सच कहा जाए तो प्राथमिक विद्यालय के बच्चों को पढ़ाने के लिए बड़ी-बड़ी डिग्री की जरुरत नहीं है बल्कि जरुरत है लग्न और मेहनत की कर्तव्यनिष्ठता की।
सरकार अपनी राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के चक्कर में इन नियोजित शिक्षकों को एक सम्मानजनक वेतन की मांग पर राजनीति करने से पीछे नहीं हटती है। नियोजित शिक्षकों द्वारा राज्यकर्मी तथा समान कार्य के समान वेतन की मांग किए जाने पर वर्तमान सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश बाबू जनता से राय मांगते है और जनता के बीच इन्हें अयोग्य शिक्षक साबित करते है। वाह रे नीतीश बाबू क्या आप अयोग्य शिक्षक हीं बहाल करते है जिससे कि उन्हें चपरासी से भी कम वेतन देना पड़े ?तो आपको किसने रोक रखा है कि आप योग्य शिक्षक की बहाली हीं न करें।
क्या इन्हीं अयोग्य शिक्षकों से आप बिहार का भविष्य संवारना चाहते हैं?
अपने ही द्वारा बहाल शिक्षकों की अपने ही शिकायत?
हद हो गई! सरकार की यह सोंच और व्यवहार नियोजित शिक्षकों के साथ ही नाइंसाफी नहीं है बल्कि इस पूरे बिहार की जनता के साथ नाइंसाफी है। सरकार यदि इतना ही ईमानदार है तो अपना वेतन भी बढ़ाने के लिए जनता के बीच जाकर जनता से राय मांगती। सिर्फ वोट बैंक की राजनीति करते हैं?यह शोभा नहीं देता! बिहार के बच्चों को पढ़ लिखकर यदि उन्हें शिक्षक बनना भी होगा तो वे सौ बार सोचेंगे कि शिक्षक बने कि न बने। उसका मनोबल टूट चुका होता है और शोषण का शिकार बन जाता है।
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचनाओं से स्पस्ट है कि शिक्षा के गिरते स्तर के लिए सरकार की नीति,नियम और व्यवहार दोषी है। सरकार को अपनी नियति और सोंच बदलनी पड़ेगी। सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी,गणित और विज्ञान विषय के शिक्षक मिले इसलिए जरुरत है शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा देते हुए एक सम्मानजनक वेतन देने की ताकि गुणवत्तापूर्ण और मेधावी शिक्षकों की रूझान सरकारी विद्यालय के तरफ हो सके।
इसके अलावे जरूरत है ईमानदारी पूर्वक स्कूल में जाकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की निरीक्षण की। न कि सिर्फ कागजों में निरीक्षण करने की और मध्याह्न भोजन में कमीशन पाने की। इसमें खराब प्रदर्शन के लिए पदाधिकारियों की अधिक जवाबदेही हो। अच्छे और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षकों को वर्ष के अंत में हर वर्ष प्रोत्साहित करने की और कामचोर शिक्षकों पर कार्रवाई करने की।
साथ ही पूरे भारत में सामान स्कूल प्रणाली लागू हो और सबकी परीक्षा का प्रश्नपत्र वर्गवार एक ही हो और उसके मूल्यांकन का तरीका भी एक जैसा हो ताकि किसी भी पद पर जाने के लिए सबको समान अवसर मिले , तभी जाकर शिक्षा का स्तर ऊंचा उठेगा।अन्यथा गरीबों के साथ अन्याय ही होगा। बिहार समेत हमारे देश का शिक्षा स्तर भी अन्य देशों से गिरता चला जाएगा। जो हमारे देश के पिछड़ेपन का कारण बनेगा।साथ ही शिक्षकों को पढ़ाने के अलावे किसी अन्य काम में भी न लगाई जाय। मध्याह्न भोजन की जिम्मेदारी शिक्षक से हटाकर किसी दूसरे के हाथों सौंपी जाए। तब बिहार ही नहीं बल्कि देश भी तरक्की करेगा।

📝ॐ प्रकाश सिंह के वाल से प्राप्त आलेख…

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