रात का आँगन

0
104

रात के अंधेरे में खुले आसमान तले,
जब मैं उन तारों को झिलमिलाते देखती हूँ..
तब एहसास होता है कि कितने तन्हा हैं ये,
मेरी तरह सब मौन बैठे हैं एक दूसरे से दूर,
नहीं किसी को किसी की फ़िकर है…
सब अपने-अपने ख़यालों में मानो खोए हैं।
अपने प्रिय के बिछड़ने के गम में जागते हुए सोए हैं।
जानते हो कैसे?
ठीक उसकी तरह, जिसका कोई नहीं इस दुनिया में,
जो उसकी बातों को सुन सके समझ सके
और उसकी वैल्यू को आंक सके!
रात के आँगन के इन तारों को भीड़ में एकाकीपन का एहसास,
और अपने-आप में खोए हुए मैं महसूस रही हूँ।
पते की बात यह है कि भीड़ में मैं भी तन्हा रहती हूँ।
सबके साथ होकर भी अपने-आप में खोई रहती हूँ।
आज आँगन में इन तारों के एकाकीपन की साक्षी बनी मैं,
लिखने लगी इनके दर्द को जो छिपा बैठे थे ये सदियों से।
वैज्ञानिकों ने इन्हें निश्चित दूरी पर फिक्स बताया है,
अपने अक्ष और कक्ष से अलग हो एक दूजे से कदापि नहीं मिल सकते।
इनकी ये दर्दभरी कहानी सदियों से दफ़न है।
ये मिलना भी चाहें तो अपने अस्तित्व को ही खो देंगे।
यही तो होता है जब कम्फर्ट ज़ोन पार कर कोई निकल पड़ता है….
मिलने अपनी बेनाम रिश्तों से, तो खो देता है अपना खुद का ही बजूद।
आज रात के आँगन में लिखी जाएगी एक गाथा
जो सिखलाएगी कि अपने दायरे में रहना कितना कम्फर्ट होता है।
आज इन एकाकी तारों को मैं शत-शत नमन करती हूँ
जो झुण्ड में रह कर भी अपने दायरे में सदा सीमित रहते हैं।
वे सूरज के आगमन पर छुप जाते हैं,
जैसे उन्हें उजाले से भय लगता हो…
हर रोज फिर वही सगुफ्ता को दुहराते हुए
टकटकी लगा एक नए इंतेज़ार में..
शायद किसी रोज़ टूट कर बिखर जाऊँ,
और जा मिलूँ मैं अपने वास्तविक अस्तित्व में।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here