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कविता

रहना तैयार,,,
आ रहे हैं हम शिक्षक
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05 सितंबर को गांधी मैदान,
देख दुनियां हो जाएगा हैरान,
देखना शिक्षक मौन रहेंगे,
काली पट्टी मुँह पर बांध रहेंगे।

‘समीर’ की इस मौन से,,,,
फरिया लेना ताकत है जितना,
अंधी, गूंगी, बहरी, तानाशाही शासक
तेरे कान न फट गए तो कहना!

ये तूफ़ान के पहले की शांति है।
इसे कमज़ोर समझने की भूल न कर,
तू अपने कान को खोल,
आँख से देख और मुँह से कुछ बोल,
वरना थू-थू होगा पूरे विश्व में,
खुल जाएगी, तेरे फूटे ढोल की पोल।

04 लाख की आवाज कब तक दबा पाओगे?
गूँजेगी अब हर शिक्षक की आवाज़,
हर गली, हर नुक्कड़, गांव से शहर तक।
हर प्रखण्ड, हर जिले, सड़क से संसद तक।

अंधी, गूंगी, बहरी और तानाशाही की सरकार,
नहीं चलेगी, नहीं चलेगी!

लाठी-गोली और छल कपट की सरकार,
नहीं चलेगी, नहीं चलेगी!

शिक्षकों को सम्मान देना होगा,
देना होगा, देना होगा!

इन्कलाब ज़िन्दाबाद
ज़िन्दाबाद, ज़िन्दाबाद!

शिक्षक एकता ज़िन्दाबाद,
ज़िन्दाबाद, ज़िन्दाबाद!

धन्यवाद
आपका
मौर्यवंशी संजीव समीर
सह संस्थापक सदस्य, शिक्षक चौपाल,

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